ऑनलाइन डिलीवरी से छोटे दुकानदारों का शटर डाउन
जोमैटो, स्विग्गी और ब्लैंकिट समाज में ऐसी पकड़ बनाई कि लोग बाजार की गलियों में खुली दुकानों को भूल गए।
कभी 15 से 20 साल के बच्चे छोटी-छोटी घर की जरूरत के लिए घर से उनकी मम्मी 50 रुपए देकर दूध,ब्रेड,सब्जी, धनिया, पनीर मंगाती थी।
लेकिन आज यह दौर बदल गया है अब सोफा पर पड़े पड़े बच्चे ब्लैंकेट पर आर्डर कर रहे हैं। अगर घर में नौकर काम करते हैं तो वे भी किचिन की जरूरी चीजों के बारे ऑर्डर कर रहे हैं। आज टेक्नोलॉजी ने इंसान को घर से ऑफिस और ऑफिस से घर का छोड़ा है।
पहले बच्चे ऑफिस से आते हुए अपने पापा को कोई न कोई फरमाइश जरुर बोलते थे कि, पापा आज आप ब्रेड, मिठाई, या फल लेते आना ।अब ऐसा नहीं है पापा सीधे ऑफिस से घर आते हैं।
छोटे दुकानदार की आमदनी कॉलोनी के खरीदारों पर टिकी रहती थी। अब सन्नाटा सा नजर आता है।
ब्लैंकेट ने कॉपी, पेन, पेंसिल से लेकर सिगरेट तक बेचना शुरू कर दिया है और 10 मिनट में डिलीवरी भी हो जाती है होलसेल में माल खरीदने की वजह से यह छोटे दुकानदारों से सस्ता भी देने लगे हैं ।
भला कोई छोटे दुकानदारों से सामान क्यों खरीदेगा। जो रिश्ता कॉलोनाइजर के बच्चों और दुकानदारों के बीच था वह रिश्ता अब खत्म होता चला जा रहा है। दुकानदार ग्राहक का चेहरा देखते ही समझ जाता था की यह ग्राहक को क्या चाहिए। जब छोटे बच्चे तोतली आवाज में छोटे दुकानदारों से सामान मांगते थे तो दुकानदार उनकी तोतली भाषा को समझ जाता था और सामान पैक कर दे देता था।
कभी कभी ग्राहक उधार भी सामान ले जाते थे। लेकिन अब अर्थ की दुनियां में आपका स्वागत है, जहां सब कुछ बदल चुका यदि आपके पास पैसा है तो ही आप टिक पाओगे वर्ना आपको कोई उधार नहीं देगा, क्यों कि zomato स्वीगी ब्लैंकिट उधार नहीं देते।
कॉलोनी के जो बच्चे 15 से 20 साल के दुकानदार से क्या लेने आए हैं, दुकानदार उनके बोलने से पहले ही समझ जाता था। काउंटर पर सामान आ जाया करता था ।
और इससे छोटे दुकानदार की आर्थिक स्थिति ठीक रहती थी। आज हालात बदल चुके हैं। छोटे दुकानदार अपना शटर डाउन कर रहे हैं और बड़े दुकानदार जैसे जोमैटो, स्विग्गी ब्लैंकेट जैसे अपने शोरूम और गोदाम बड़ा बना रहे हैं।
अगर हम पश्चिमी व्यवसाय की बात करें, तो वहां पर बड़े-बड़े शोरूम आपको दिखाई देंगे छोटे-मोटे दुकानदार आपको कहीं भी दिखाई नहीं देंगे। क्या भारत अब पश्चिम के व्यवसाय की ओर बढ़ रहा है। यदि ऐसा है तो छोटे व्यवसाय खत्म हो जाएंगे और लोग डिलीवरी बॉय बनकर रह जाएंगे। आज बड़े-बड़े मेट्रो शहर में डिलीवरी बॉय की संख्या 1000 के करीब पहुंच चुकी है। बेरोजगार युवा मोटरसाइकिल लेकर डिलीवरी बॉय बनकर रह गया है वह अपना कोई भी छोटा-मोटा किराना स्टोर, जनरल स्टोर, ग्रॉसरी स्टोर खोलने की नहीं सोच पा रहा। क्योंकि खोलने के दौरान जो लागत आती है उसके अनुसार वह रुपया नहीं कमा पा रहा है। अब यह दौर बड़े शहरों से टियर 2 शहरों की ओर बढ़ रहा है।
कोका-कोला,पेप्सी, बेकारी का सामान भी अब ब्लैंकेट पर।
आपको बता दें कि कोको कोला से लेकर फास्ट फूड अब ब्लैंकेट से घर पहुंचने लगा है।
एक समय था जब कोका-कोला पीने के लिए दुकान पर जाया करते थे और जैसे ही दुकानदार का कोको कोला की बोतल का ढक्कन खोलना था मुंह में पानी आ जाता था। अब ऐसा नहीं है । सब कुछ घर पर उपलब्ध हो चुका है इंटरनेट और डिजिटल दुनियां की बदौलत सारा परिदृश्य बदल चुका है।
यह दुनिया अब पैसे वालों की।
वह दिन दूर नहीं जब कामआने वाली छोटी-छोटी जरूरत का सामान खरीदने के लिए परेशान होंगे। अगर माध्यम वर्ग व गरीब वर्ग को मोबाइल पर आर्डर देना नहीं आया।
तो उनको कई किलोमीटर दूर छोटे-छोटे सामान खरीदने के लिए जाना पड़ सकता है और इस वजह से उनकी गरीबी और बढ़ेगी ।
हाल ही में देखने में आया है कि बाजार से दुकान बंद हो रही हैं और ब्लैंकेट के जो गोदाम है उनमें सामान बढ़ता चला जा रहा है।
जोमैटो स्विग्गी और ब्लैंकेट ने बेरोजगारों को डिलीवरी बॉय बनाकर उनकी बेरोजगारी 200, 400 रुपए देकर काफी हद तक दूर की है। लेकिन उनकी शादी के लाले पड़ रहे हैं। लेकिन कहीं ना कहीं दूसरी तरफ नजर डालें तो छोटी-छोटी दुकान बंद होने से छोटे-छोटे दुकानदार अब बेरोजगार हो गए हैं। भारत का मध्यम वर्ग अब अपना छोटा दुकान नहीं खोल पाएगा।


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