अछूतों को जब सड़क पर चलने का अधिकार नहीं था। तब अय्यंकाली ने दौड़ा दी थी बैलगाड़ी।
हेमंत सागर, कंटेंट राइटर।
वर्ष 1893 जब केरल में अछूत समुदाय को सड़क पर चलने का अधिकार नहीं था। तब अय्यंकाली ने दो हट्टे कट्टे बैलों को सजा कर और बैलगाड़ी को राजा महाराजाओं की तरह बनाकर उस पर सवारी कर नए बने पुल पर दौड़ा दिया था ।
अय्यंकाली के इस क्रांतिकारी क़दम से पूरे केरल राज्य में हलचल मच गई। जातिवादी लोगों की छाती पर सांप लोट गए, क्योंकि साल 1893 में जब केरल राज्य में छुआछूत चरम पर थी।
दलितों को सड़क पर चलने का अधिकार नहीं था।
अय्यंकाली उस समय समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ रहे थे । वह एक समाज सुधारक थे, जिन्होंने दलित वर्ग के लोगों के अधिकार के लिए काम किया। अय्यंकाली ने बैलगाड़ी इसलिए दौड़ाई ताकि वह दिखा सके कि, दलित वर्ग के लोग भी ऊंची जाति के लोगों की तरह सवारी कर सकते हैं। उस समय दलित वर्ग के लोगों को सवारी करने का अधिकार नहीं था। उन्हें पैदल ही चलना पड़ता था। अय्यंकाली ने इस भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और बैलगाड़ी दौड़कर दिखाई की दलित वर्ग के लोग भी समानता के अधिकार के हकदार हैं।
अय्यंकाली ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ जीवन पर्यंत्र काम किया। समानता का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया ।
उनकी गतिविधियों ने समाज में एक बड़ा बदलाव लाने में मदद की ।
दलित की छाया मात्र से हो जाते थे लोग अपवित्र
दलित वर्ग के लोगों को सड़क पर चलने। जातिगत भेदभाव। अस्पृश्यता की भावना। और उन्हें अछूत माना जाता था। उनकी छाया में आने से ऊंची जाति के लोग अपवित्र हो जाते थे।
कौन थे अय्यंकाली
अय्यंकाली केरल राज्य में एक प्रमुख सामाजिक सुधारक थे। जिन्होंने केरल में जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनका जन्म 28 अगस्त 1863 के केरल की वेनमनड में हुआ था। नवंबर 1980 में, इंदिरा गांधी ने तिरुवनंतपुरम में कौडियार वर्ग में अय्यांकाली की मूर्ति का अनावरण किया।
आज की स्थिति
आज भारतीय संविधान लागू होने की वजह से समय बदला है।
सभी नागरिकों को समानता का अधिकार दिया गया है। जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं।
हालांकि अभी यह छुआ छूत का कलंक मौजूद है। और इसके खिलाफ लड़ने के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है।



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